हम तो इश्क़ में पहले से ही पागल थे
तू और दीवाना ना बना
ये तेरी इनायत है या मोहब्बत मेरी
मुझे अपनों से यूँ तो बेगाना, ना बना
 
शाम हु शील, होते- होते, यूँ ही गुजर जाऊंगा
तु महफ़िलो में ग़ुलाबी अँधेरा ना रख
तेरे चाहने वालो की भीड़ बहुत है, काबिल
मुझे टूटी हुई तस्वीरो में यूँ दीवारों पर ना रख
 वो एक शहर था,
टूटना, बसना उसकी फितरत थी
तू मुसाफ़िर है, हर राहेदर पे पैर संभल के रख
और यहाँ अहसास है, मंजिल का सभी को
तू रास्तो से ज़रा शील, फांसला बना के रख