क्यों ज्ञान का आकलन आज प्रतिशत में बदल गया ?

अच्छा चरित्र और अच्छा स्वास्थ्य दोनों के साथ कक्षा ५ से कक्षा ६ में प्रवेश हो गया। प्राथमिक विधालय में कक्षा ५ तक प्रति-दिन सुबह प्रार्थना के बाद और छुट्टी होने से पहले कक्षा अध्यापक गणित के पहाड़े सामूहिक रूप से कंठस्थ कराते और क्रमशः सभी को एक एक दिन कक्षा के सामने खड़ा होकर बोलने के लिए कहा जाता। कक्षा ५ तक सभी को कम से कम २५ तक पहाड़े याद होना अनिवार्य था और क्योंकि प्रधानाध्यापक (हैड मास्टर जी) कक्षा लेते थे तो भय भी बना रहता और उनके सम्पर्क का एक विशेष अनुभूति भी। कक्षा ५ (पाँच ) में पहाड़े १२ की तालिका से प्रारम्भ होते और २५ पर खत्म हो जाते, पहाड़े बोलने का सभी कक्षा के छात्रों का एक ही सुर और लय होता तो सभी को रट भी जाते और फिर गणित की कक्षा में कटवाँ पहाड़े पूछना तो बस अलग ही मनोरंजन होता कई बार तो अध्यापक जी अँगुलियों के बीच नटराज की पेंसिल डाल देते और हाथ को अपने हाथो से जब दबाते तो आँशु भी आँखो को बिना बताये मासूम से गालो पे टपकते। 
गणित के गुना और भाग के सभी प्रशन, तालिका पर निर्भर थे और इस बिन्दु को अध्यापक जानते थे तो बस पूरा ध्यान पहले तालिका पर और फिर अभ्यास पर, फिर क्या आष्चर्य सभी के प्रशन ठीक होते। लेकिन प्रतिस्पर्धा इस बात की कि किसने प्रशन पहले किया। गणित के प्रश्न भी आम जिंदगी से जुड़े हुए, कृषि -खेती और आटे -दाल से अत: प्रश्न भी और पुस्तक भी अपनी लगती। माँ कभी नुक्कड़ की दूकान से सामान मंगाती तो वापसी में पूरा बकाय का लेखा -जोखा गणित के प्रशन के आधार पर, माँ को समझाया जाता। अभ्यास-पुस्तिका भर जाती तो १ रुपया लेकर ५० पैसे की पुस्तिका और १५ पैसे की तीन जामिनी श्याइ की बट्टी लेते और ५ पैसे की दो संतरे की लेमचूष। बचे पैसे वापिस माँ को दे देते। 
खेतो में तालाब के किनारे उगने वाले तिल्लु के पैड से कलम बनाते तो हाथ पर ब्लेड (टोपाज) भी लग जाया करता। तो अध्यापक जी अपने साथ एक तेज पतला सा चाक़ू भी रखा करते। लेकिन अध्यापक से कलम बनवाने का एक अलग ही अध्यात्म का सुख प्रदान करता। मास्टर जी से प्रार्थना करते की हमारे कलम की नोक टूट गयी है आप कलम बना दो और देखिये मास्टर जी जब कलम बनाते तो प्रारम्भ के छिलके बड़ी दूर तक उड़ते और मास्टर जी तो अनुभवी फटाफट छिलके उड़ाते और हम तो मन ही मन खुश होते कलम की नोक और उड़ते छिलको को देखकर। छिलने के बाद जो मास्टर जी जो नोक काटते वो बड़ा ही कौतहूल का विषय रहता क्योंकि वो नोक थोड़ा सा तिरछा काटते और बड़ी सफई से । उसके बाद तो उस कलम से जो लिखा जाता उसका वर्णन नहीं हो सकता। 
कक्षा ६ में जाने का समय आया तो बताया गया की अब आप कलम से नहीं होल्डर से लिखोगे। पहले तो बड़ा दुःख हुआ लेकिन जब लिखा तो अच्छा लगा। अब जामिनि शयाई के लिए भी मना हो गयी थी तो चेलपार्क की रॉयल ब्लू से लिखना प्रारम्भ कर दिया। नई कक्षा थी और नए मित्र भी अंग्रेजी का विषय भी लगा था, पहली बार A, B, C, D को देखा था तो कुछ हिचकचाहट भी थी। कृषि विषय में देसी हल बनाते तो मास्टर जी बड़ा खुश होते और यहाँ तो A for Apple and B for Bat प्रारम्भ हो गया था। हमारे मास्टर जी तो चिकनी मिट्टी से आम, केला और दूसरे फलो को बनवाते थे, हम भी बड़े खुश होकर उनमे जीवन के रंग डाल दिया करते। और बड़ी सुंदरता से उनमे रंग भरा किया करते। मिट्टी का कार्य और हमारा कौशल मास्टर जी को दिखाई पड़ता रहा। 
गणित, सामाजिक, कृषि और कला विषयों से निकलकर नए विषयो को पढ़ना अच्छा लग रहा था लेकिन अंग्रेजी के समय काल के आधार पर वाक्यो के नियम कुछ खास आकर्षित नहीं कर पाये। लेकिन विषय थे तो पढ़ना पड़ा और जीवन के इस पड़ाव पर भी देशी ज्ञान -विज्ञानं और परिस्थितियों का ज्ञान छोड़कर विदेशी भाषा में विदेशी ज्ञान ग्रहण किया। इस पुरानी पडी अंक तालिका ने मुझको मेरे विषयो के आधार पर रचनात्मक प्रवर्त्ती प्रदान की है और सोचने पर विवश किया की आज बच्चे अथक प्र्याशो के बाद  भी पहाड़े क्यों याद नहीं कर पाते और क्यों एक छोटी सी गुना, भाग के लिए संगणक का प्रयोग करते हैं ? क्यों अध्यापक अपने अध्यापन और छात्र के समय का प्रयोग मुख्यता फाइलों को पूरा करने में लगाता है ? क्यों एक छात्र अपनी समस्या अपने अध्यापक से नहीं कर पाता ? क्यों अध्यापक प्रेरणा और ज्ञान का स्रोत न होकर व्यवसाय का स्रोत हो गया ?
और क्यों ज्ञान का आकलन आज प्रतिशत में बदल गया ?

डाo सुशील कुमार 

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Dr Sushil Kumar

Dr. Sushil Kumar, a physicist, an eminent researcher and a teacher for the benefit of students and fellow physicists alike. Apni Physics is an effort to create a better platform and also to help the students to be able to have content at their hands whenever they want, online. Dr. Sushil continues to upload his lectures and post articles about latest researches in physics, academic, physics education, and also lessons about daily life and how physics define every aspect of our everyday movement and life.

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