भारत जैसे देश की रचनात्मक प्रकृति ही है जहाँ देश में बच्चे शिक्षा और साधनो के अभाव में भीख मांगने पर प्रयोग करते है। सामाजिक जीवन में कई बार इन दर्शयों को देखकर दुःख की अनुभूति होती है । देश का दुर्भाग्य कहना होगा जहाँ भविष्य शहर की चौड़ी सड़को के किनारे, या चौराहो पर यातायात के संकेतो पर रुकी गाड़ियों में झांकता है। बड़े ही विस्मय की बात है, बच्चो को बच्चे के रूप में न देखकर सभ्य समाज का अंग एक डर के साथ अपने वाहन के दरवाजे खिड़कियाँ बंद कर लेता है या फिर एक कड़वी सी डांट के साथ भगा देता है ।
बच्चो का शिक्षा के परती लगाव न होना उनके पारिवारिक और सामाजिक दायरों का एक परिणाम है। ऋतुओ का मानसिक प्रभाव भी कभी कोई नजर नहीं आता, तपती दोपहर में नंगे पाँव चलना और सर्द दिनों में नंगे शरीर, बिना वस्त्रो के सड़क किनारे पड़ी प्लास्टिक के थैलो से खेलना। सड़क पर प्लास्टिक की बोतल डालकर, गाड़ी के पहियें के नीचे आ जाने के क्षण का बड़े धैर्य से इंतजार करना।
प्रतिदिन की किर्या और कर्म का कोई निश्चित समय निर्धारित नहीं। जब सुबह उठे तो मित्रो के साथ सीधे सड़क पर आ गए । प्रति दिन समाज के वयवहार से और ज्यादा सहानुभूति व धन प्राप्त करने की लालसा, और इस कारणवश नयी शैली का प्रयोग अधिक रचनात्मकता का विकास।
देश का भविष्य कितना रचनात्मक है, ये इसी बात से निश्चित हो जाता है कि ये बच्चे सहानुभूति व धन प्राप्त करने के लिए स्वयं ही एक ऐसे विचार के लिए अनुसन्धान या फिर प्रयोग करते हैं कि सामान्य जन के लिए इनके प्रति उदासीनता क्षण भर के लिए भंग हो ही जाती है।
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