तेरे इश्क़ में बेख़बर हूँ कि
कुछ दरवाज़े यूँ तलाश रहा हूँ
जो इस गली इस शहर में नहीं मगर
तेरी जुस्तजू में हर चीज़ जहाँ
मै दिल के आईने से देख रहा हूँ
गुजरते लम्हे भी पूछने लगे है
अब बीती हुई अँगड़ाईयो पे सवाल
वो ख्वाब अच्छे थे शील कब
“गति से दूर” जाते देखा था जिसको
भ्रम होता तो टूट ही जाता
यूँ इतनी सलवटे डालकर भी क्यों वक़्त
आँखों से आँखे मिलाता था कोई
सुशील कुमार
कुछ दरवाज़े यूँ तलाश रहा हूँ
जो इस गली इस शहर में नहीं मगर
तेरी जुस्तजू में हर चीज़ जहाँ
मै दिल के आईने से देख रहा हूँ
गुजरते लम्हे भी पूछने लगे है
अब बीती हुई अँगड़ाईयो पे सवाल
वो ख्वाब अच्छे थे शील कब
“गति से दूर” जाते देखा था जिसको
भ्रम होता तो टूट ही जाता
यूँ इतनी सलवटे डालकर भी क्यों वक़्त
आँखों से आँखे मिलाता था कोई
सुशील कुमार

