मेरा शहर और दंगा
दर्द हवा में और , घायल जिस्म जमीं पे पड़े हैं , कोई पत्थर, शायद किसी मंदिर -मस्जिद को छुआ है । आज की शाम, दर्द -ऐ -हवा , रुक-रुक…
दर्द हवा में और , घायल जिस्म जमीं पे पड़े हैं , कोई पत्थर, शायद किसी मंदिर -मस्जिद को छुआ है । आज की शाम, दर्द -ऐ -हवा , रुक-रुक…
जिंदगी ने यूँ तो मुझको , रोका है हर मोड़ पर, दीवार बनके , "दिल सीने में , दफ़न करके," यूँ कुछ गुजरा हूँ मैं, अक्सर तूफ़ान बनके । बने…
आज फिर उन सभी की इच्छा रखने पर , मै पिक्चर देखने के लिए तैयार हो गया, फिर मन मै वो ही कशमश थी लेकिन जल्दी ही मेने उससे अपना…
इस कविता में एक लड़का आठ -नौ साल का , जो थका , भूखा सा एक पुरानी लम्बी सी शर्ट और फटी हुई पैंट पहेने हुए फल बेच रहा है…