अब तो आदत सी हो गयी है
तुम बिन जीने की
रिश्तो के दर्द भी
अंधेरो में पीने की
गिर जाता हूँ हर रोज़
साँवली शाम के आँचल में
तो उठता हूँ सरे शाम
कभी मयखानों से
हाल अच्छा है रहने दे अभी
होंगे रंग बाकी कई
देखने तेरी तस्वीर के अभी
ढूंढता हूँ काली श्याह रातो में
लेकर वफ़ा की सफ़ेद छाँव
टपकता ना हो
रिश्तो का दर्द जिससे
जगह ऐसी कोई
बाकी तो नहीं अभी

