
फूल को क्या पता था
उसकी खुशबू से सरोकार शहर
अब नहीं होता
हद तो हो गयी जब मय्यत से उठकर
बागबान भी दुहरा होकर बैठ गया
ऐ खुदा ये दौर कब रुकेगा
अपना ही अपने को गैर कहने से जब रुकेगा
घर तो ये मेरा भी था
मुझे घर से बेघर करने का दौर ये कब रुकेगा
शाम कर लूँगा बशर कहीं बिराने में
मगर तेरे अपनों का क्या होगा
और में पहले भी शिकार हुआ हूँ
नजरो का तेरी
वफ़ाई में सर कट भी जाय तो डर क्या होगा ?
@सुशील
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