यहाँ जख्मों को बाँटने का रिवाज़ चला है
कुछ जख़्म हरे हो तो उन्हे बेच दो
ये बेमौसमी जख्मे सामान बिक जाएगा
यूँ ही सोच- सोच कर वक़्त ज़ाया ना करो
तुमको मालूम नहीं की ये जख्म पक कर
कब लाल हो जाये
और ये अपनापन, ये दीवानगी
कब नासूर हो जाये
यहाँ जख्मों को बाँटने का रिवाज़ चला है
कोई जख़्म कब हरा हो जाये मालूम नहीं Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!
कुछ जख़्म हरे हो तो उन्हे बेच दो
ये बेमौसमी जख्मे सामान बिक जाएगा
यूँ ही सोच- सोच कर वक़्त ज़ाया ना करो
तुमको मालूम नहीं की ये जख्म पक कर
कब लाल हो जाये
और ये अपनापन, ये दीवानगी
कब नासूर हो जाये
यहाँ जख्मों को बाँटने का रिवाज़ चला है
कोई जख़्म कब हरा हो जाये मालूम नहीं Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!
वो घर वाले अपनों के बीच
दीवार खड़ी करने में माहिर हैं
कहो उनसे
कभी – कभी खुशियां भी घरो में
गैरो के बाँट दिया करो
यहाँ जख्मों को बाँटने का रिवाज़ चला है
कुछ जख़्म हरे हो तो उन्हे बेच दिया करो
सुशील कुमार
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