
मेरी हसरते तेरे मुकाम की मोहताज नहीं
मै जीता हूँ की बस साँसो को
आने- जाने का ख्याल होता रहे
मुझे किसी के दिल की आवाज अक्सर
दस्तक तो देती है
क्यों यूँ मै हर शाम से दरवाजा
अब खुला रखता हूँ
यूँ ! शराफ़त की बन्दिश लगी ना होती
यूँ ! हर मोड़ पे तेरा मिलना नहीं होता
यूँ! जिंदगी जब घूम के आये सारा जहां
क्यों मुनासिब हमे तेरा शहर लगा
सुशील कुमार
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